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आम !

हम जिंदगी में कईं लोगो से मिलते है | इनमे से  कुछ  लोग  हमारे  जीवन  में  अमीट  छाप  छोड़  जाते  है | इन्ही  में  से  एक  है – नत्थुकाका |

हर  गर्मी  की  छुट्टियों  में  हम  दोनों  भाई  हमारे  मामा  के  गाँव  जाते थे | गर्मी  की  छुट्टियों  की  हम  बड़ी  बेसब्री  से  हर  साल  राह  देखते | खेलकूद  और   मस्ती   में  दिन  कहाँ  निकल  जाता   पता  भी  नहीं  चलता | हर  छुट्टियों   में  हम  नए – नए  अनुभवों  के  साथ  घर  लौटते | पर  एक  व्यक्ति  का  चेहरा  हमेशा  याद  रहता  था -नत्थुकाका |

नत्थुकाका  मामाजी   के  पड़ोस  में  ही  रहते  थे | नाटा  कद  ,लम्बी  दाढ़ी  ,सिर  पर  अंग्रेजी   टोपी  (जिसका  रहस्य हमे  भी  काफी  दिनों  बाद  पता  चला ) और  जैसे-तैसे  बचे  दो  दांत  जो  बीच – बीच  में  दर्शन  दे  देते -उनकी  यह  कद–काठी  उनके  अजीबोगरीब  व्यक्तित्व   के  लिए  सटीक  थी | उनके  फटे-मैले  कपडे  और  टुटा  बिखरता  घर  उनकी  आर्थिक  परिस्तिथि   को  दर्शाता  था | हमारा  नत्थुकाका   से  वास्ता  उनके   घर  में  आम   के  पेड़  की  वजह से  पड़ा | उन  पेड़ो  पर   हर  गर्मियों  में  ढेर  सारे  आम  लगते |  शाम  को  वे  हम  बच्चो  को  बड़े  शौक   से  आम  देते | पर  उनके  आम  की  एक  खासियत  रहती -वे  कभी  पके  नहीं  होते ,हमेशा  कच्चे  ही  रहते थे |

नत्थुकाका  गाँव  में  उनकी  बातों  के  लिए  मशहुर  थे | वे  हर  चीज  में  नुक्स  निकलने  में   माहिर  थे -चाहे  वह  बात  उनके  घर  की  हो ,गाँव  की  हो  ,देश  की  हो  या   सारी  दुनिया  की | उनके  पास  लोग  अपनी  समस्या   लेकर  आते  और  नत्थुकाका  उन्हें  एक  कागज  की  पुडिया  थमा  देते | हमने  पता  लगाने  की  कोशिश  की  आखिर  उस  पुडिया  में  है  क्या ? पर  नत्थुकाका  की  पुडिया  का  रहस्य  तो  वे  ही  जानते  थे |उनके  परिवार  में  उनका  सिर्फ  एक  बेटा  था   जो  शहर  में  नौकरी  करता  था | बेटा  जब  चार  साल  का  था  तब  ही  उनकी  पत्नी  परलोक  सिधार  गयी | हर  महीने   बेटे  से   कुछ  पैसे  आ  जाते  थे  जिसमे  नत्थुकाका  अपना  गुजारा  कर  लेते | साल  में  एखाद  बार  पोते  को  देखने  शहर चले  जाते |पर  वहां  से  वे  जल्दी   गाँव  की  तरफ लौट आते |शहर  की  हवा उन्हें  कहाँ साँस  लेने देती!

एक  बार  की  बात  है ,नत्थुकाका  को  किसी  काम  से  शहर  में  जाना  पड़ा | वहा एक  दफ्तर  में  दाखिल  हुए तो  उन्हें   अजीब  घुटन  का  एहसास  हुआ |दफ्तर  तो  वातानुकूलित  था  पर  न  जाने  क्यों  नत्थुकाका  वहां  से  जल्दी  निकलना  चाहते  थे | उन्होंने  वहां  के  अधिकारी  से  मिलकर  फ़ौरन  अपना  काम  निपटाया |  जाते – जाते  वे  उस  अधिकारी  से  कह  गए ,”लगता  है  यहाँ  सभी  लोग  परेशान  है .|तभी  दफ्तर  में  इतनी  घुटन   महसूस  हो  रही  है |” परेशान  तो   सभी  थे  क्योंकि  उनके  वरिष्ठ  अधिकारी  ने  उन  सभी  को  थोड़े  ही  देर  पहले  फटकार  लगई  थी | पर  घुटन  वाली  बात  उस  अधिकारी  को  समझ   नहीं  आई |नत्थुकाका   मुस्कुरा  कर  चल  दिए |वहां  के  लोगो  की  घुटन  वहां  की  हवा   में  घुल  गयी  थी |नत्ठुकाका  , जो  गाँव  की  स्वच्छंद  हवा  में  साँस  लेते , जल्द  ही  शहर  की  घुटन  को  ताड़  गए |

नत्थुकाका गांधीवाद  के  कट्टर  विरोधी  थे |वे  कहते ,”गाँधी  को  कोई  तो काम  था  नहीं |बरिस्ट्री   नहीं  चली  तो  बदन  पर  एक  कपडा  लपेटकर  चल  दिए  सारे   देश  भर में !”कहकर  वे  एकसाथ  कई  नकारात्मक  विशेषण   जोड़   देते | ऐसे  समय  उनका  महापुरुषों  के लिए  आदर  भाव  कहीं  खो  सा  जाता |हमे  बाद  में  पता  चला  की  गांधीजी  के  कारन  ही  नत्थुकाका  का  धंधा  चौपट  हो  गया  था |नत्थुकाका  विलायती  टोपिय  लाकर  यहाँ   बेचते |उन्हें  खूब  मुनाफा  होता | शायद  उनके  सिर  पर  हमेशा  रहने  वाली  विलायती  टोपी  का  यही  राज  था | पर  गांधीजी  के  स्वदेशी  अभियान  के  कारन  उनका  धंधा   मंदा  पड़  गया |इसलिए  वे  गांधीजी  को  कोसते  और  गोरे  साहब  का  गुणगान  करते  फिरते |वे  कहते ”अरे  आज़ादी  के  पहले  लोग  अपने  थे |अब  देश  तो  अपना   हो  गया  पर  लोग  पराये  हो  गए |”

कोसने  में  तो   उन्होंने  भगवान्  को  भी  नहीं  बख्शा | वे  कहते ,”ऊपर  वाला  भी  बड़ा  अन्यायी  है |अगर  वह  न्याय  करता  तो  सभीको  एक  सामान  बनता |कोई  आमिर  या  गरीब  नहीं  होता | ”उनकी    बातों   को  सभी  हँसी  में  उड़ा  देते  पर  कभी कभी   नत्थुकाका  के  कठोर शब्द  सोचने पर मजबूर पर  कर  देते |

एक  बार  मैंने उनसे   ही  पुछा ,” काका , हमारे  यहाँ   तो  बिजली आ  गयी  है , आपके यहाँ   कब आएँगी ?”उन्होंने  मुँह फेरते हुए कहा ,” क्या करना  है  बिजली का | वैसे  भी  रोशनी  में दिखेगा क्या , वही दिवारों  में  दरारें  और  टपकती छत |” विपरीत परिस्तिथियाँ  आदमी मैं कितना कठोर बना सकती  हैं इसका जीता जागता उदाहरण नत्थुकाका थे|

पिछली छुट्टियों मैं उनसे आखिरी बार मिला तब उनकी टोपी नदारद थी | मैं पहली बार पढ़ने के लिये घर से बाहर जा रहा था | पहली बार बड़े शहर मे घर से दूर जाने का डर मुझे खाए जा रहा था, जो मेरे चेहरे पर साफ झलक रहा था | नत्थुकाका ने हमेशा की तरह मुझे आम दिये| मेरे चेहरे पर चिन्ता की लकीरें देख कर उन्होंने अपनी जेब से कागज का टुकड़ा निकाला और अंदर चले गए |. बाहर आकर उन्होंने मुझे  कागज की एक. पुडिया  थमा  दी और मुझसे कहा, “तुम्हे खूब पढ़कर आगे बढ़ना हैं|. ” मैं वहां से घर की ओर चल दिया|. जाते – जाते मैने वह पुडिया खोल कर देखनी चाहि की  आखिर उसमे हैं क्या ? कुछ  टूटे फूटे अक्षरों  लिखा था ,” जिंदगी जबतक हैं,  जिंदादिल रहो ऐसे की मौत भी आने से घबरा जाये| ” मेरे आँखें नम हो गईं| आश्चर्य की बात  थी की आज नत्थुकाका के दिये  आम मीठे थे|

समय  के साथ- साथ आम का स्वाद हो या आदमी का स्वभाव , उसमे मिठास घुल हीं जाती हैं |

-Suyog Sarda(T.Y.Comp)



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